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जनसंख्या नियंत्रण में विफल राज्यों को संसद में अधिक सीटें क्यों

WebdeskAug 24, 2021, 12:00 AM IST

जनसंख्या नियंत्रण में विफल राज्यों को संसद में अधिक सीटें क्यों


मद्रास उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से यह स्पष्टीकरण मांगा है कि जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम क्रियान्वित करने में सफल राज्यों को संसद में प्रतिनिधित्व कम क्यों है। पीठ ने केंद्र सरकार को तमिलनाडु को संसद में कम प्रतिनिधित्व होने के एवज में 5600 करोड़ रुपये का मुआवजा देने को भी कहा है



वेब डेस्क

मद्रास उच्च न्यायालय ने हाल ही में पारित एक आदेश में जनसंख्या के कारण राज्यों को संसद में मिलने वाली सीटों में अंतर को लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करने को कहा है कि जनसंख्या नियंत्रण को बेहतरीन तरीके लागू करने वाले तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के मुकाबले आबादी विस्फोट से गुजर रहे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को संसद में ज्यादा सीटें क्यों दी गई हैं। साथ ही न्यायालय ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह तमिलनाडु को मुआवजा दे।

शक्ति वितरण समान हो

मद्रास उच्च न्यायालय के जस्टिस एन. किरुबकरन और जस्टिस बी. पुगालेंधी की पीठ ने 17 अगस्त को पारित आदेश में केंद्र सरकार से यह स्पष्टीकरण मांगा है। यह जस्टिस किरुबकरन का अपने पद से सेवानिवृत्त होने से पहले आखिरी आदेश था। पीठ ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण संसद में राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधियों की संख्या तय करने का आधार नहीं हो सकता। राज्य पुनर्गठन अधिनियम-1956 के हिसाब से राज्य भाषाई आधार पर पुनर्गठित होते रहे हैं। भारत एक बहुधर्मी, बहुजातीय और बहुभाषीय देश है। इसलिए शक्ति वितरण समान होना चाहिए और शक्ति संतुलन बना रहना चाहिए।

तमिलनाडु को मुआवजा दे केंद्र सरकार

पीठ ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम को क्रियान्वित करने में विफल प्रदेश इस कार्यक्रम को सफलता से क्रियान्वित करने वाले प्रदेशों के मुकाबले संसद में अधिक प्रतिनिधित्व पा रहे हैं। कार्यक्रम को सफलता से क्रियान्वित करना प्रदेशों का दोष नहीं है जिसके कारण संसद में उनका प्रतिनिधित्व कम हो। इसलिए इन प्रदेशों को पुरस्कार के रूप में लोकसभा की सीटें कम होने पर राज्यसभा में बढ़ी हिस्सेदारी दी जानी चाहिए। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि केंद्र सरकार तमिलनाडु को पिछले 14 आम चुनावों में कम प्रतिनिधित्व पाने के एवज में मुआवजा दे। यह मुआवजा लगभग 5600 करोड़ रुपये बैठता है।

पीठ ने कहा कि 1962 तक तमिलनाडु के लोकसभा में 41 प्रतिनिधि होते थे। प्रदेश द्वारा जनसंख्या नियंत्रण किए जाने से लोकसभा क्षेत्रों की संख्या बाद में घटकर 39 रह गई। पीठ ने 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव का हवाला दिया और कहा कि यह महज दो सीट की बात नहीं है, बल्कि हर वोट मायने रखता है।

 

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