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विदेशी धरती पर स्वतंत्रता की अलख

WebdeskAug 19, 2021, 04:58 PM IST

विदेशी धरती पर स्वतंत्रता की अलख


चिटगांव में युद्ध का प्रशिक्षण लेते हुए मास्टर सूर्य सेन की इंडियन रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य।
 


भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन केवल आज के भारत की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं था।
इसकी पहुंच तब के समूचे भारत में थी। बल्कि कई सेनानियों ने इसके भी आगे बढ़ कर भारत की
स्वतंत्रता के लिए समर्थन जुटाया था। दुर्भाग्यवश, इस तथ्य को सही तरीके से दर्ज नहीं किया गया।



आलोक बंसल

अक्सर कहा जाता है कि इतिहास से सबक न सीखने वाले उसकी गलतियों को दोहराने का काम करते हैं। दुर्भाग्यवश, भारतीयों में ऐतिहासिक समझ की अधिकांशत: कमी रही है। वैश्विक समुदाय प्राचीन भारत की ओर विदेशी दृष्टिकोण से ही देखता है, क्योंकि प्राचीन भारत के संबंध में मिलने वाले अधिकतर वृत्तांत फाहियान, ह्वेनसांग और आइ-सिंग जैसे चीनी यात्रियों ने ही लिखे हैं। मौर्य साम्राज्य के बारे में यूनान का मेगस्थिनीज हमें बताता है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आने वाले परवर्ती यात्री जैसे अलबरूनी, मार्को पोलो, इब्नेबतुता, अब्दुल रज्जाक, निकोलो कोंती, अफ्नासे निकितिन और कई अन्य ने दुनिया को प्राचीन भारत, उसके लोगों और उसकी समृद्ध-संस्कृति के बारे में बताया। इसके बाद अनेक पुर्तगाली यात्रियों का आगमन आरंभ हुआ जिसकी शुरूआत वास्को डि गामा से हुई थी, जिसने भारत की समृद्धि के बारे में लिखा। हैरानी है, कि इस दौरान, कल्हण की राजतरंगिनी को छोड़, किसी भारतीय ने जाना-माना ऐतिहासिक प्रबंध नहीं लिखा। नतीजतन, भारतीयों को अपने इतिहास को दूसरों के नजरिये से देखने की आदत पड़ गई। इस कारण खुद अपने इतिहास को देखने के संबंध में अनेक भ्रम पैदा हो गए।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एक विराट अभियान था। होम रूल के लिए लाखों लोगों ने इसमें शिरकत की थी। दुर्भाग्यवश, इस तथ्य को भी सही तरीके से दर्ज नहीं किया गया। लिहाजा, ऐसे अनेक लोगों के योगदान, जिन्होंने अपना जीवन और समय न्योछावर किया, उनका उचित आकलन या उनके प्रति कृतज्ञता भी नहीं दिखाई गई। इसलिए इस पर पुनर्दृष्टि डालनी बेहद जरूरी है।

चिटगांव शस्त्रागार डकैती कांड
इस धारा में पहला महत्वपूर्ण पक्ष यह जानना है कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन केवल आज के भारत की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं था। इसकी पहुंच तब के समूचे भारत में थी। इसलिए, जब हम स्वतंत्रता अभियान के लीडरों की बात करते हैं, तो मास्टर सूर्य सेन या मास्टर दा, एक अभूतपूर्व व्यक्तित्व के रूप में सामने आते हैं। लेकिन आज देश में कितने लोग जानते हैं कि वह कौन थे या उन्होंने क्या किया। अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए चिटगांव शस्त्रागार डकैती बेशक सबसे दुस्साहसिक प्रयासों में से थी। बाद में लंबे समय तक यंत्रणा देने के बाद उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था और विधिवत अंतिम संस्कार न करके समुद्र में दफना दिया गया था। अपने मित्र को लिखे उनके अंतिम शब्द बेहद मार्मिक हैं, ह्यमौत मेरे दरवाजे पर दस्तक दे रही है। मेरा मस्तिष्क अनंत की ओर उड़ा जा रहा है ...ऐसे सुमधुर, ऐसे नाजुक, ऐसे गंभीर मौके पर, मैं तुम्हारे लिए क्या पीछे छोड़ जाऊं? केवल एक ही चीज, जो है मेरा सपना, एक सुनहरी सपना - आजाद भारत का सपना... 18 अप्रैल 1930 की तारीख ना भूलना, चिटगांव के पूर्वी विद्रोह का दिन... अपने दिलों के केंद्र में उन देशभक्तों के नाम लिख लो जिन्होंने भारत की आजादी की वेदी पर अपने प्राण दिए।ह्ण अफसोस है कि भारत में शायद ही किसी को यह तारीख या उन स्वतंत्रता सेनानियों की याद होगी। ऐसा लगता है कि सूर्य सेन भारत के जिस हिस्से में जन्मे और रहे, उसका भारत का हिस्सा ना होना भी इस कमजोर स्मृति का कारण रहा है। दरअसल, वह और उनके जैसे लोग उस समय भारत के लिए लड़े थे, जब बंटवारे का विचार पैदा भी नहीं हुआ था। अत: यह प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य बनता है कि वह स्वतंत्रता अभियान के इन नायकों को जाने, जिनका कार्यक्षेत्र आज के भारत तक सीमित नहीं था।

फांसी पर लटके हेमू कलानी
अफसोस, कि अधिकांश भारतीय सुक्कूर (सिंध) के हेमू कलानी को नहीं जानते जिन्हें मात्र 19 बरस की आयु में अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया था। सन् 1942 में जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया तो हेमू इसमें कूद पड़े। उन्हें यह गुप्त जानकारी मिली कि अंग्रेजी सेना हथियारों से भरी रेलगाड़ी रोहड़ी शहर से होकर गुजरेगी। हेमू कालाणी ने अपने साथियों के साथ रेल पटरी को अस्त-व्यस्त करने की योजना बनाई। वहां तैनात पुलिस कर्मियों की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने हेमू को गिरफ्तार कर लिया और 21 जनवरी, 1943 को उन्हें फांसी दे दी गई। जाहिर है, सिंध में उनका कोई स्मारक नहीं। सुक्कूर में उनके नाम के पार्क का नाम बदल कर कासिम पार्क कर दिया गया था। जिसके जवाब में कुछ भारतीय शहरों ने इसकी भरपाई करते हुए अपने यहां मार्गों, पार्कों और संस्थानों के नाम उनकी याद में रखे, परंतु यह मुख्यत: सिंधी समुदाय की पहल थी। वह सिंध के लिए नहीं, भारत की आजादी के लिए लड़े थे, इसलिए पाकिस्तान नहीं बल्कि भारत को उनके योगदान को याद रखना होगा। पाकिस्तान में ही, जिस चौराहे पर भगत सिंह को फांसी दी गई थी, उसका नाम भगत सिंह चौक रखने को वहां के कट्टरपंथियों और पुरातनपंथियों का पुरजोर विरोध झेलना पड़ा है। पाकिस्तान की प्रकृति को देखते हुए साफ है कि वह इसे स्वीकार नहीं करेगा। इसके विपरीत, भारत को ही उन्हें पहचान देनी पड़ेगी, जिसके लिए वह लड़े थे।

राजा महेंद्र प्रताप की भारत की पहली अस्थायी सरकार
याददाश्त की यह कमजोरी केवल उन्हीं स्वतंत्रता सेनानियों के संबंध में नहीं जो आज के भारत से बाहर के क्षेत्रों में जन्मे थे, बल्कि भारत से बाहर काम करने वाले सभी सेनानियों से जुड़ी है। अधिकांश भारतीयों ने राजा महेंद्र प्रताप के बारे में नहीं सुना जो निर्वासन के दौरान 1 दिसंबर 1915 को काबुल में गठित भारत की पहली अस्थायी सरकार के अध्यक्ष थे। हालांकि उन्हें 1932 में नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था, लेकिन भारत में लोग उनके बारे में नहीं जानते। उन्होंने बाहर से भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी। दुनिया भर में घूमकर उन्होंने अभियान के लिए सहयोग प्राप्त किया। उन्होंने न केवल अफगानिस्तान में अस्थायी सरकार गठित की, बल्कि कैजर विल्हेम द्वितीय से मिलकर उनका सहयोग भी हासिल किया था। स्वतंत्रता अभियान के आरंभिक दौर में, क्रांतिकारियों ने जहां तक संभव हुआ, लोगों का सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया था। राजा महेंद्र प्रताप की भूमिका पर बात करते हुए, हमें श्यामजी कृष्ण वर्मा और लाला हरदयाल जैसी अनेक हस्तियों की भूमिका भी सराहनी होगी। अधिकांश भारतीय उनके योगदान को नहीं जानते। नेताजी के आगमन से पूर्व, भारतीय स्वतंत्रता अभियान के लिए विदेशों में सहयोग जुटाने वाले रासबिहारी बोस भी जापान में गुमनाम मौत मरे थे। यहां तक कि नेताजी और उनकी आजाद हिन्द फौज के अमूल्य योगदान पर भी उचित अध्ययन नहीं किया गया है। आजाद हिन्द फौज के अनेक योद्धा आज भी गुमनाम जीवन जी रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व इंडिया फाउंडेशन ने रानी झांसी रेजिमेंट के एक सदस्य का सम्मान किया था। इससे पहले कि वह पीढ़ी समाप्त हो जाए, आजाद हिन्द फौज के इतिहास का दस्तावेजीकरण करना जरूरी है। अधिकांश भारतीय आजाद हिन्द फौज के कार्यों से अनभिज्ञ हैं।

म्यांमारी सेनानी भी लड़े भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई
सच तो यह है कि अंग्रेजों ने भारतीय सशस्त्र सेनाओं पर पूरी तरह विश्वास उठ जाने के बाद ही भारत छोड़ा था। इस तथ्य पर भी गर्व करना होगा कि अपने साथियों के लिए प्रथम विश्व युद्ध लड़ने वाले भारतीय थे, न कि अमेरिकी, अंग्रेज या रूसी। इसी सेना ने ब्रिटिश साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान किया था और आजाद हिन्द फौज के बाद अंग्रेजों को अहसास होने लगा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा सशस्त्र सेनाओं में भी आ पहुंची है। आजाद हिन्द फौज ने अंडमान और निकोबार द्वीपों में, और मणिपुर एवं नगालैंड में तिरंगा फहराया था। हालांकि, भारतीय स्वतंत्रता अभियान से जुड़ा केवल एक असामयिक तथ्य अलग-थलग दिखता है। म्यांमार के कई क्षेत्र आईएनए से जुड़े थे। उसके अधिकांश सैनिक कभी भारत नहीं आए थे, लेकिन उन्होंने भी भारत माता के लिए जानें दीं। इसलिए जरूरी है कि आईएनए की कार्यशैली, उसके सैन्य योगदान, कौन उसके साथ जुड़े और कालांतर में उनका क्या हुआ, इन तथ्यों पर शोध जरूरी है। दरअसल, भारत उन्हें भूल गया था, उन्हें पेंशन नहीं मिली, हालांकि उनमें से अनेक लोगों ने अपनी समूची जायदाद देश को सौंप दी थी। दक्षिण-पूर्व एशिया में ऐसे कई लोग हैं जिनके अभिभावक आईएनए से जुड़े थे। वह उस समय भारत के लिए लड़े, लेकिन हम आज भी उन्हें नहीं जानते।

नौसैनिक संग्राम से हिल गईं ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें
भारतीय स्वतंत्रता अभियान के अनेक योद्धा विदेश गए, लेकिन उनके मिशन असफल होने पर उनका क्या हुआ। कुछ ने विदेशी जमीन पर गुमनामी में दम तोड़ा। यह अध्याय आज तक छुपा कर रखा गया है। जाहिर है, अंग्रेज नहीं चाहते थे कि भारतीय उनके बारे में जानें, क्योंकि इससे अन्य लोग भारतीय सशस्त्र सेनाओं से जुड़ने को प्रेरित होते। अफसोस, कि भारतीय स्वतंत्रता के बाद भारतीय इतिहासकारों ने भी उनके साथ न्याय नहीं किया। आजादी के बाद, बंगाल के पूर्व ब्रिटिश गवर्नर की भारत यात्रा पर उनसे अंग्रेजों के भारत छोड़ने का कारण पूछा गया तो उनका जवाब आईएनए और नौसेना विद्रोह था। नौसेना विद्रोह एक और अध्याय है जो भारतीय याददाश्त से बाहर है। 1946 में नौसैनिकों ने जहाजों पर कब्जा कर उन पर तिरंगे फहराए थे। दरअसल, इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला दी थीं और अंग्रेज समझ गए थे कि परिस्थितियों पर काबू पाना उनके बस का नहीं है और उन्हें जाना पड़ा। दुर्भाग्यवश यह तथ्य भी दर्ज नहीं किया गया। नौसेना विद्रोह के प्रमुख सेनानियों में से कुछ को फांसी दी गई थी। वह भारतीय स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे और घटना को नौसेना विद्रोह कहना वैसा ही होगा जैसा कि 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम को सिपाही विद्रोह कहना। यह बेहद अपमानजनक है और इन मुद्दों को नए सिरे से देखने का समय आ पहुंचा है।

लाला हरदयाल : दुनियाभर में जगाई स्वतंत्रता की अलख
लिहाजा, जरूरी है कि भारतीय स्वतंत्रता अभियान पर पुन: दृष्टि डाली जाए। इनमें कुछ कहानियों परी कथाओं सरीखी लगती हैं। ऐसा एक उदाहरण लाला हरदयाल का है जो उन दिनों एशिया से यूरोप और अफ्रीका से अमेरिकी महाद्वीपों तक हवाई यात्राएं करते थे, जब हवाई यात्राएं दुर्लभ होती थीं। तीक्ष्ण बुद्धि के दम पर उन्होंने 1905 में आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से दो छात्रवृत्तियां प्राप्त की और 1907 में आइसीएस से जुड़ने ही वाले थे कि उन्होंने ‘आइसीएस का नाश हो’ नामक पत्र लिखा, छात्रवृत्तियां छोड़ी और भारत लौटकर साधारण जीवन जीने लगे थे। 1909 में वह पेरिस गए और वन्दे मातरम नामक समाचार पत्र के संपादन से जुड़े। फिर पेरिस छोड़ वह अल्जीरिया पहुंचे और वहां से दक्षिण अमेरिका के सुदूर द्वीप मार्टिनीक पहुंचे, जहां भाई परमानन्द ने उन्हें तब ढूंढ़ा जब वह भूख-प्यास से बेहाल थे। वहां से वह संयुक्त राज्य अमेरिका पहुंचे और गदर पार्टी को वैचारिक सहयोग दिया, जो सात समंदर पार से अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने वाला पहला संगठित अभियान था। 1914 में उन्हें अमेरिकी सरकार ने गिरफ्तार किया, इसलिए वह बर्लिन फरार हो गए, जहां उन्होंने बर्लिन समिति गठित की जो बाद में भारतीय स्वतंत्रता समिति के तौर पर जानी गई और पहले विश्व युद्ध के समय उसने जर्मनों को सहयोग दिया था। युद्ध के दौरान वह जर्मनी और तुर्की में रहे, लेकिन बाद में एक दशक तक तटस्थ रहने के बाद स्वीडन चले गए थे। इस दौरान उनकी भारत लौटने पर पाबंदी थी और यह समय उन्होंने लंदन यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने और यूरोप, एशिया एवं अमेरिका घूमने में बिताया। 1939 में संदिग्ध तौर पर जहर दिए जाने से उनकी मृत्यु हुई थी।

भारतीय स्वतंत्रता अभियान के जिस महत्वपूर्ण पक्ष को अक्सर भुला दिया जाता है, वह यह, कि यह देश की आजादी का संयुक्त अभियान था, जिसमें समाज के प्रत्येक धड़े से लोग आकर जुड़े थे। मौलवी बरकतुल्ला के सलाहकार राजा महेन्द्र प्रताप थे। गदर पार्टी के सोहन सिंह भखना को सहयोग देने के लिए पंडित कांशीराम और लाला हरदयाल मौजूद थे। कुछ इतिहासकारों ने इसे सिख अभियान बताने का प्रयास किया है, जबकि इसके आरंभिक संस्थापकों में सभी समुदायों के लोग थे जिन्होंने एक भारत की आजादी के लिए इस अभूतपूर्व अभियान का बिगुल फूंका था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एक विराट अभियान था, जो ना केवल अखिल भारतीय स्तर पर था, बल्कि कई महाद्वीपों तक फैला था। यह अभियान न केवल भारत में जारी रहा, बल्कि भारत से बाहर, अमेरिका से यूरोप और अफ्रीका से लेकर उन देषों तक भी जहां भारतीयों को इसे समझने की जरूरत थी।

 इसे समझकर हमें भारत के समक्ष मुंह बाए खड़ी कई समस्याओं के समाधान खोजने की समझ मिल सकती है। समय आ पहुंचा है कि भारतीय स्वतंत्रता अभियान के इतिहास को भारतवासी समझें और इन बिसरे सेनानियों के संबंध में और अधिक शोध को
अंजाम दें।   

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