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विभाजन त्रासदी के वे 15 दिन

WebdeskAug 17, 2021, 03:40 PM IST

विभाजन त्रासदी के वे 15 दिन

मई 1947 में गांधी जी ने कहा था कि अगर बंटवारा होगा तो वह मेरी लाश पर होगा।


माउंटबेटन ने जल्दबाजी में विभाजन के साथ भारत की स्वतंत्रता की घोषणा की थी। लेकिन आजादी मिलने के 15 दिन पहले तक जो हुआ, उसमें बहुत अंतर था। यह अंतर कार्यशैली, सोच, विचार सभी में था।


 

प्रशांत पोल

भारत को स्वतंत्रता मिलने के पहले 15 दिन बड़ी हलचल और गड़बड़ी वाले थे। एक ओर आजादी की खुशी थी, दूसरी ओर विभाजन का दु:ख था। दंगों की ज्वालाएं इसे और विदारक बना रही थी। इन 15 दिनों में देश के नेतृत्व का असली चेहरा सबके सामने आया। इसकी शुरुआत देश के उत्तरी छोर की स्वतंत्रता के साथ हुई। महात्मा गांधी 1-3 अगस्त  तक जीवन के पहले व अंतिम दौरे पर श्रीनगर में थे। 2 अगस्त को वे रियासत के महाराजा हरि सिंह से मिले। 1 अगस्त की सुबह अंग्रेजों ने गिलगिट और बाल्टिस्तान की सारी चौकियों से यूनियन जैक उतार लिया और वहां कश्मीर रियासत का झंडा लहराने लगा। इन 15 दिनों में सरदार वल्लभ भाई पटेल केंद्रीय मंत्रिमंडल के सबसे व्यस्त मंत्री थे, जो सभी रियासतों को भारतीय संघ राज्य में मिलाने के प्रयास में जुटे थे। वहीं, जोधपुर, हैदराबाद, जूनागढ़ और भोपाल स्वतंत्र रहने या पाकिस्तान के साथ जाने के सपने देख रहे थे।

माउंटबेटन ने 3 जून, 1947 को विभाजन के साथ भारत की आजादी की घोषणा की और पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, बंगाल आदि क्षेत्रों में दंगे शुरू हो गए, जो बढ़ते गए। हिंदुत्व आधारित शक्तियां विभाजन के विरोध में थीं। पहले गांधीजी भी विरोध में थे, पर बाद में समर्थन किया। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर शुरू से विभाजन के पक्षधर थे। 3 जून को विभाजन के फैसले के बाद सभी जनसंख्या की अदला-बदली के साथ विभाजन चाहते थे, पर कांग्रेस ने इसका विरोध किया। 6 अगस्त को गांधीजी ने लाहौर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बैठक बुलाई थी। 17 अगस्त को विभाजन रेखा प्रकाशित होने के बाद सीमावर्ती क्षेत्रों से हिंदू-सिखों को भगाया जाने लगा। सितंबर-अक्तूबर में दंगे चरम पर थे। इन दंगों में 10 लाख से ज्यादा लोग मारे गए और डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए। सरदार पटेल ने 1-15 अगस्त तक अनेकों पत्र लिखे, लेकिन जवाहर लाल नेहरू 14 अगस्त की मध्यरात्रि में होने वाले सत्ता के हस्तांतरण कार्यक्रम की तैयारी कर रहे थे। इसलिए सीमावर्ती क्षेत्रों में दंगों को लेकर उदासीन थे। वहीं, रा.स्व. संघ पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान के हिंदूू-सिखों को बचाने व सुरक्षित लाने के प्रयासों में जुटा था। तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी 5-8 अगस्त तक सिंध प्रांत में रहे।

एक तरफ नेहरू स्वतंत्र भारत में यूनियन जैक फहराने की तैयारी कर रहे थे, जबकि गांधी जी कह रहे थे, ‘‘लाहौर अगर मर रहा हैं, तो आप भी उसके साथ मौत का सामना करो..।’’ वहीं, हैदराबाद (सिंध) में श्री गुरुजी राजा दाहिर की प्रेरणा जगाकर हिम्मत के साथ संगठित होकर जीने का सूत्र दे रहे थे। कांग्रेस अध्यक्ष की पत्नी सुचेता कृपलानी कराची में सिंधी महिलाओं से कह रही थीं, ‘आपके मेकअप, लो कट ब्लाउज के कारण मुस्लिम गुंडे आपको छेड़ते हैं’, वहीं कराची में राष्ट्र सेविका समिति की मौसीजी हिंदू महिलाओं को संस्कारित रहकर बलशाली, सामर्थ्यशाली बनने का सूत्र दे रही थीं। कांग्रेस के हिंदू कार्यकर्ता पंजाब, सिंध छोड़कर हिंदुस्थान भाग रहे थे और मुस्लिम कार्यकर्ता मुस्लिम लीग के साथ मिल गए थे, वहीं स्वयंसेवक जान की बाजी लगाकर हिंदू-सिखों की रक्षा कर रहे थे।

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